बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू

चौपाई ४, दोहा २९६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥ राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥ ४ ॥

अर्थ

आपके और मिथिलेश्वर जनकजी के विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार से भद्दा (अनुचित) है। आपकी और महाराज की जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।

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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना