समय समाज धरम अबिरोधा
समय समाज धरम अबिरोधा
चौपाई २, दोहा २९६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥ जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥ २ ॥
अर्थ
तब रघुकुल के पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अविरोधी (अर्थात् अनुकूल) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया। फिर भरतजी की कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना