ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी
चौपाई २, दोहा २९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥ भूप भरतु मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥ २ ॥
अर्थ
जैसे मुख [का प्रतिबिम्ब] दर्पण में दीखता है और दर्पण अपने हाथ में है, फिर भी वह (मुख का प्रतिबिम्ब) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजी की यह अद्भुत वाणी भी पकड़ में नहीं आती (शब्दों से उसका आशय समझ में नहीं आता)। [किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाज के साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदों के खिलानेवाले (सुख देनेवाले) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।