सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र
दोहा २९५ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥ २९५ ॥
अर्थ
मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओं ने बुरी सलाह करके बुरा ठाट (षड्यन्त्र) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का दोहा २९५ है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना