राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन
दोहा २९३ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥ २९३ ॥
अर्थ
अतएव मुझे पराधीन जानकर (मुझसे न पूछकर) श्रीरामचन्द्रजी के रुख (रुचि), धर्म और [सत्य के] ब्रत को रखते हुए, जो सब के सम्मत और सब के लिये हितकारी हो, आप सब का प्रेम पहचानकर वही कीजिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का दोहा २९३ है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना