सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही
चौपाई १, दोहा २९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥ फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥ १ ॥
अर्थ
देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा--हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजी की बुद्धि को फेर दीजिये। और छल की छाया कर देवताओं के कुल का पालन (रक्षा) कीजिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना