प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा
चौपाई ३, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा॥ मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥ ३ ॥
अर्थ
सयाना होने पर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और गुनता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मन से सारी वासनाएँ भाग गयीं। केवल श्रीरामजी के चरणों में लव लग गयी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह