जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास
दोहा १०९ (ग) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥ १०९ (ग) ॥
अर्थ
मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहन लेता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का दोहा १०९ (ग) है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह