बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा
बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा
चौपाई ६, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥ ६ ॥
अर्थ
हे गरुड़जी! उनसे मैं श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरि के गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजी की कृपा से मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात् मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था)।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह