सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु

दोहा १०९ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ १०९ (क) ॥

अर्थ

शिवजी के वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर 'ऐसा ही हो' यह कहकर मुझे समझाकर और शिवजी के चरणों को हृदय में रखकर अपने घर गये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का दोहा १०९ (क) है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह