त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ

चौपाई १, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥ एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥ १ ॥

अर्थ

तिर्यक्‌ योनि (पशु-पक्षी), देवता या मनुष्य का, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीर में) मैं श्रीरामजी का भजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजी का कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात्‌ मैंने ऐसे कोमल-स्वभाव, दयालु गुरु का अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा)।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह