कहु खगेस अस कवन अभागी
कहु खगेस अस कवन अभागी
चौपाई ४, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥ प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥ ४ ॥
अर्थ
हे गरुड़जी! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदही की सेवा करेगा ? प्रेम में मग्न रहने के कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर हार गये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह