चरम देह द्विज कै मैं पाई

चौपाई २, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥ २ ॥

अर्थ

मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और श्रुति देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरीर में) भी बालकों में मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजी की ही सब लीलाएँ किया करता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह