इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला

चौपाई ७, दोहा १०९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥ जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्र द्रोह पावक सो जरई॥ ७ ॥

अर्थ

इन्द्र के वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, काल के दण्ड और श्रीहरि के विकराल चक्र के मारे भी जो नहीं मरता, वह विप्र-द्रोह रूपी अग्नि से जल जाता है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह