अस बिबेक राखेहु मन माहीं

चौपाई ८, दोहा १०९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ ८ ॥

अर्थ

ऐसा विवेक मन में रखे रहो। तुम्हारे लिए जग में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह