भए कालबस जब पितु माता

चौपाई ५, दोहा ११० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥ जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥ ५ ॥

अर्थ

जब पिता-माता कालवश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तों की रक्षा करनेवाले श्रीरामजी का भजन करने के लिये वन में चला गया। वन में जहाँ-जहाँ मुनीश्वरों के आश्रम पाता, वहाँ-वहाँ जा- जाकर उन्हें सिर नवाता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह