एहि कर होइ परम कल्याना

चौपाई १, दोहा १०९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥ बिप्र गिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥ १ ॥

अर्थ

हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरे के हित से सनी हुई ब्राह्मण की वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु की क्षमायाचना, शाप के अनुग्रह में परिणत होने और काकभुशुण्डि की आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।

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गुरु की क्षमायाचना, शाप का अनुग्रह