श्रीसीता-हनुमान संवाद
हनुमानजी विनम्रतापूर्वक श्रीरामजी की मुद्रिका और संदेश सीताजी को देते हैं। सीताजी उन्हें अपना संदेश सौंपती हैं और प्रभु के शीघ्र आगमन की आशा व्यक्त करती हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ७ / २०
प्रकरण पाठ
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमानजी मधुर वचन बोले--।
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥ १ ॥
अर्थ:
भगवान् का जन जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा--] हे तात हनुमान्! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए।
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४ ॥
अर्थ:
वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओं का] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं--] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनीत वचन बोले--।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥ ५ ॥
अर्थ:
हे माता! सुकृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित [शरीर से] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है।
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ १ ॥
अर्थ:
[हनुमानजी बोले--] श्रीरामचन्द्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान।
कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २ ॥
अर्थ:
और कमलों के वन भालों के वन के समान हो गए हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गई है।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥ ३ ॥
अर्थ:
और राक्षसों को मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गाएँगे। [सीताजी ने कहा--] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा हैं।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥ ४ ॥
अर्थ:
अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेर) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था।
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥ १ ॥
अर्थ:
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमानजी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजी के प्रिय जानकर हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २ ॥
अर्थ:
हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। “प्रभु कृपा करें” ऐसा कानों से सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये।