सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं
चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४ ॥
अर्थ
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गईं। उन्हें शरीर की सुध नहीं रही।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-हनुमान संवाद