हनुमानजी द्वारा अशोकवाटिका विध्वंस, अक्षयकुमार वध और मेघनाद का हनुमानजी को नागपाश में बाँधकर सभा में ले जाना
सीताजी को आश्वस्त करने के बाद हनुमानजी अशोकवाटिका उजाड़ देते हैं और अनेक राक्षसों को परास्त करते हैं, जिनमें अक्षयकुमार भी सम्मिलित है। अंततः मेघनाद उन्हें नागपाश में बाँधकर रावण की सभा में ले जाता है।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ८ / २०
प्रकरण पाठ
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥ ३ ॥
अर्थ:
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहार से] लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ का कर दिया (रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमानजी अपने शरीर से मसलने लगे।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥ ४ ॥
अर्थ:
उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गए हों। हनुमानजी ने उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े। उसको क्षणभर के लिये मूर्च्छा आ गयी।
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥ तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ १ ॥
अर्थ:
उसने हनुमानजी को ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्ष से नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गए हैं, तब वह उनको नागपाश से बाँधकर ले गया।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ २ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमानजी ने स्वयं अपने को बँधा लिया।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४ ॥
अर्थ:
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भृकुटि देख रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशंक खड़े रहे जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशंक (निर्भय) रहते हैं।