श्रीसीता-त्रिजटा संवाद
राक्षसियों के बीच त्रिजटा सीताजी को सांत्वना देती है और शुभ संकेतों का वर्णन करती है। उसके वचनों से निराशा के बीच आशा की किरण प्रकट होती है।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण ६ / २०
प्रकरण पाठ
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १ ॥
अर्थ:
उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा--सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३ ॥
अर्थ:
सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने कहा--] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
अर्थ:
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। आग दे, विरह-रोग का अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोग को बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा)। सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमानजी को कल्प के समान बीता।