अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी
चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ २ ॥
अर्थ
मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-हनुमान संवाद