बचनु न आव नयन भरे बारी
बचनु न आव नयन भरे बारी
चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४ ॥
अर्थ
वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओं का] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं--] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनीत वचन बोले--।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-हनुमान संवाद