कह कपि हृदयँ धीर धरु माता
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता
चौपाई ५, दोहा १५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५ ॥
अर्थ
हनुमानजी ने कहा--हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्रीरामजी का स्मरण करो। श्रीरघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-हनुमान संवाद