हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी

चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥ १ ॥

अर्थ

भगवान् का जन जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा--] हे तात हनुमान्! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-हनुमान संवाद