सहज बानि सेवक सुखदायक
सहज बानि सेवक सुखदायक
चौपाई ३, दोहा १४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥ ३ ॥
अर्थ
सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बानी है। क्या वे श्रीरघुनाथजी कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले गातों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-हनुमान संवाद