मोरें हृदय परम संदेहा

चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥ ४ ॥

अर्थ

अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेर) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-हनुमान संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी को श्रीराम की मुद्रिका और संदेश देने तथा उनके प्रभु-आगमन की आशा का संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-हनुमान संवाद