बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं

चौपाई २, दोहा ७७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥ जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥ २ ॥

अर्थ

वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश गाते हैं। हे अनंत! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओं का [महान् विपत्ति से] उद्धार किया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।

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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार