अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन

छन्द, दोहा ७८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

अर्थ

अत्यन्त गर्व के कारण वह शकुन-अशकुन का विचार नहीं करता। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथ से गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं। सियार, गीध, कराल गधे और कुत्ते बहुत अधिक बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो काल के दूत हों॥

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का छन्द, दोहा ७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।

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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार