ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ
दोहा ७८ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥ ७८ ॥
अर्थ
जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के वश हो रहा है, राम विमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त की शान्ति हो सकती है?
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का दोहा ७८ है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।
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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार