असगुन अमित होहिं तेहि काला
असगुन अमित होहिं तेहि काला
चौपाई ५, दोहा ७८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला॥ ५ ॥
अर्थ
उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओं के बल का बड़ा गर्व होने से वह उन्हें गिनता नहीं है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।
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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार