सो अबहीं बरु जाउ पराई

चौपाई ३, दोहा ७८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥ ३ ॥

अर्थ

अच्छा है, वह अभी भाग जाए। युद्ध में विमुख होने में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसका मैं उत्तर दूँगा।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।

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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार