तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई
चौपाई २, दोहा ७६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥ लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥ २ ॥
अर्थ
इतने पर भी वह नहीं उठा, [तब] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़ लिए और लातों से मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस, भीषण युद्ध और प्रभु-कृपा से उसके उद्धार का वर्णन है।
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मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस और उद्धार