रोम राजि अष्टादस भारा
रोम राजि अष्टादस भारा
चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥ उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥ ४ ॥
अर्थ
अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना क्या की जाय ?
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का राम-महिमा कथन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को श्रीराम की दिव्य महिमा बताकर वैर छोड़ने की विनती का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
मंदोदरी का राम-महिमा कथन