सजल नयन कह जुग कर जोरी
सजल नयन कह जुग कर जोरी
चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥ कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥ ४ ॥
अर्थ
नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [रावण से] कहने लगी- हे प्राणनाथ ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम ! श्रीराम से विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का राम-महिमा कथन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को श्रीराम की दिव्य महिमा बताकर वैर छोड़ने की विनती का वर्णन है।
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मंदोदरी का राम-महिमा कथन