फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा
सोरठा १६ (ख) · लंकाकाण्ड
सोरठा पाठ
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥ १६ (ख) ॥
अर्थ
यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान भी गुरु मिलें, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत (ज्ञान) नहीं होता।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का राम-महिमा कथन” प्रकरण का सोरठा १६ (ख) है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को श्रीराम की दिव्य महिमा बताकर वैर छोड़ने की विनती का वर्णन है।
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मंदोदरी का राम-महिमा कथन