जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता

छन्द, दोहा ८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा॥

अर्थ

मरे हुए मन में भी कामदेव जागने लगा, वन की सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्नि का सच्चा मित्र शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरों में अनेकों कमल खिल गये, जिन पर सुन्दर भौंरों के समूह गुंजार करने लगे। कलहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “कामदेव का भस्म होना” प्रकरण का छन्द, दोहा ८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कामदेव का शिव की तपस्या भंग करने हेतु प्रस्थान और शिव के क्रोध से उनका भस्म का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
कामदेव का भस्म होना