फिरत लाज कछु करि नहिं जाई
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई
चौपाई ३, दोहा ८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥ ३ ॥
अर्थ
लौटने में लज्जा लगती है और कुछ किया भी नहीं जा सकता। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज प्रकट हुआ। फूले हुए नये-नये वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गयीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “कामदेव का भस्म होना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कामदेव का शिव की तपस्या भंग करने हेतु प्रस्थान और शिव के क्रोध से उनका भस्म का वर्णन है।
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कामदेव का भस्म होना