धरी न काहूँ धीर सब के
धरी न काहूँ धीर सब के
सोरठा ८५ · बालकाण्ड
सोरठा पाठ
धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥ ८५ ॥
अर्थ
किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिये। श्रीरघुबीर ने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “कामदेव का भस्म होना” प्रकरण का सोरठा ८५ है। इस प्रकरण में कामदेव का शिव की तपस्या भंग करने हेतु प्रस्थान और शिव के क्रोध से उनका भस्म का वर्णन है।
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कामदेव का भस्म होना