कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा
चौपाई ३, दोहा ९२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥ देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ
एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवाङ्गनाएँ मुसकरा रही हैं [और कहती हैं कि] इस वर के योग्य दुलहिन जग में नहीं मिलेगी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की शिव से विवाह-प्रार्थना और सप्तर्षियों के पार्वती के पास जाने का वर्णन है।
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देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास