मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं
चौपाई २, दोहा ९३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥ अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥ २ ॥
अर्थ
महादेवजी [यह देखकर] मन-ही-मन मुसकराते हैं कि हरि के व्यंग्य-वचन नहीं जाते। अपने प्रिय के अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भृंगी को प्रेरित कर अपने सब गणों को बुला लिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की शिव से विवाह-प्रार्थना और सप्तर्षियों के पार्वती के पास जाने का वर्णन है।
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देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास