तात अनल कर सहज सुभाऊ
तात अनल कर सहज सुभाऊ
चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥ गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई॥ ४ ॥
अर्थ
हे तात! अग्रिका तो यह सहज स्वभाव ही है कि पाला उसके समीप कभी जा ही नहीं सकता और जानेपर वह अवश्य नष्ट हो जायगा। महादेवजी और कामदेवके सम्बन्धमें भी यही न्याय (बात) समझना चाहिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की शिव से विवाह-प्रार्थना और सप्तर्षियों के पार्वती के पास जाने का वर्णन है।
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देवताओं की प्रार्थना, सप्तर्षि पार्वती के पास