जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी

चौपाई ३, दोहा २४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥ निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥ ३ ॥

अर्थ

यद्यपि घर में बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि [स्वामी की सेवा का महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।

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रामराज्य का वर्णन