सब निर्दंभ धर्मरत पुनी
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी
चौपाई ४, दोहा २१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ ४ ॥
अर्थ
सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणों के ज्ञाता और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ हैं, कपट-सयानी किसी में नहीं है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।
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रामराज्य का वर्णन