सो महिमा समुझत प्रभु केरी

चौपाई २, दोहा २२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥ सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥ २ ॥

अर्थ

बल्कि प्रभु की उस महिमा को समझ लेने पर तो यह कहने में [कि वे सात समुद्रों से घिरी हुई सप्तद्वीपमयी पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट् हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परन्तु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीला में बड़ा प्रेम मानते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।

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रामराज्य का वर्णन