जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ
चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥ कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवा की विधि को जाननेवाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।
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रामराज्य का वर्णन