दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक

दोहा २२ · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥ २२ ॥

अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचनेवालों के नृत्यसमाज में है और “जीतो” शब्द केवल मन के जीतने के लिये ही सुनायी पड़ता है (अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदिको दमन करने के लिये साम, दान, दण्ड और भेद--ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसी को नहीं होता; 'दण्ड' शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहनेवाले दण्ड के लिये ही रह गया है। तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गयी; 'भेद' शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिये ही कामों में आता है।)

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का दोहा २२ है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।

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रामराज्य का वर्णन