जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव

दोहा २४ · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥ २४ ॥

अर्थ

देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, वे ही अपने [महामहिम] स्वभाव को छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविंद में प्रीति करती हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामराज्य का वर्णन” प्रकरण का दोहा २४ है। इस प्रकरण में रामराज्य में धर्म, सुख, समृद्धि और प्रजा के कल्याण का वर्णन है।

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रामराज्य का वर्णन