गुरुजी का अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत
काकभुशुण्डि अपने पूर्व जन्म की वह घटना सुनाते हैं जिसमें गुरु का अनादर होने पर शिवजी का शाप प्राप्त हुआ। यही कठोर मोड़ आगे चलकर दिव्य कृपा का कारण बनता है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १४ / २१
प्रकरण पाठ
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥ ३ ॥
अर्थ:
जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर (वहाँ से निकलकर) वे तिर्यक् योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दुःख पाते रहते हैं।
बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥ ४ ॥
अर्थ:
अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और अरे अधम से भी अधम! इस अधोगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह।