गुरुजी का अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत

काकभुशुण्डि अपने पूर्व जन्म की वह घटना सुनाते हैं जिसमें गुरु का अनादर होने पर शिवजी का शाप प्राप्त हुआ। यही कठोर मोड़ आगे चलकर दिव्य कृपा का कारण बनता है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १४ / २१

प्रकरण पाठ

दोहा

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥ १०६ (क) ॥

अर्थ:

एक दिन मैं शिवजी के मन्दिर में शिवनाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमान के मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया।

दोहा

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥ १०६ (ख) ॥

अर्थ:

गुरुजी दयालु थे, [मेरा दोष देखकर भी] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदय में लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके।

दोहा 107 के अंतर्गत
चौपाई

मंदिर माझ भई नभबानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥ जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥ १ ॥

अर्थ:

मन्दिर में आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरु के क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्त के हैं और उन्हें [पूर्ण तथा] यथार्थ ज्ञान है।

चौपाई

तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥ जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥ २ ॥

अर्थ:

तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [क्योंकि] नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। ओरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय।

चौपाई

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर (वहाँ से निकलकर) वे तिर्यक्‌ योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दुःख पाते रहते हैं।

चौपाई

बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और अरे अधम से भी अधम! इस अधोगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह।

दोहा

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥ १०७ (क) ॥

अर्थ:

शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजी ने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदय में बड़ा सन्ताप उत्पन्न हुआ।

दोहा

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ (ख) ॥

अर्थ:

प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी घोर गति का विचार कर गदगद स्वर से विनती करने लगे—