श्रीराम-वसिष्ठ संवाद, श्रीरामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना
गुरु वसिष्ठ और श्रीरामजी के बीच गूढ़ आध्यात्मिक संवाद होता है। इसके बाद प्रभु अपने भाइयों सहित अमराई में जाते हैं और सहज प्रेममय वातावरण प्रकट होता है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १० / २१
प्रकरण पाठ
महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥ ३ ॥
अर्थ:
हे भगवन्! आपकी महिमा की सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहिती का कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निंदा करते हैं।
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥ १ ॥
अर्थ:
जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रम के] धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थ-स्नान आदि जहाँ तक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं [उनके करने का]--।
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥ ३ ॥
अर्थ:
संसार के सभी श्रमों को हरनेवाले प्रभु ने [हाथी, घोड़े आदि बाँटने में] श्रम का अनुभव किया और [श्रम मिटाने को] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई (आमों का बगीचा) थी। वहाँ भरतजी ने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उस पर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे।
मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥ ४-५ ॥
अर्थ:
उस समय पवनपुत्र हनुमानजी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे--] हे गिरिजे! हनुमानजी के समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजी के चरणों का प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवा की [स्वयं] प्रभु ने अपने श्रीमुख से बार-बार बड़ाई की है।