श्रीराम-वसिष्ठ संवाद, श्रीरामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना

गुरु वसिष्ठ और श्रीरामजी के बीच गूढ़ आध्यात्मिक संवाद होता है। इसके बाद प्रभु अपने भाइयों सहित अमराई में जाते हैं और सहज प्रेममय वातावरण प्रकट होता है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १० / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥ अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

एक बार मुनि वसिष्ठजी वहाँ आये जहाँ सुन्दर सुख के धाम श्रीरामजी थे। श्रीरघुनाथजी ने उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणामृत लिया।

चौपाई

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥ देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥ २ ॥

अर्थ:

मुनि ने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर श्रीरामजी! मेरी कुछ विनती सुनिये! आपके आचरणों (मनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह (भ्रम) होता है।

चौपाई

महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे भगवन्! आपकी महिमा की सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहिती का कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निंदा करते हैं।

चौपाई

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥ परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥ ४ ॥

अर्थ:

जब मैं उसे नहीं लेता था, तब ब्रह्माजी ने मुझे कहा था—हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्यरूप धारण कर रघुकुल के भूषण राजा होंगे।

दोहा

तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥ ४८ ॥

अर्थ:

तब मैंने हृदय में विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्म से पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है।

दोहा 49 के अंतर्गत
चौपाई

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥ १ ॥

अर्थ:

जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रम के] धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थ-स्नान आदि जहाँ तक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं [उनके करने का]--।

चौपाई

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥ तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥ २ ॥

अर्थ:

[तथा] हे प्रभो! अनेक तंत्र, वेद और पुराणों के पढ़ने और सुनने का सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनों का भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलों में सदा-सर्वदा प्रेम हो।

चौपाई

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

मैल से धोने से क्या मैल छूटता है? जल के मथने से क्या कोई घी पा सकता है? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जल के बिना अन्तःकरण का मल कभी नहीं जाता।

चौपाई

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥ ४ ॥

अर्थ:

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणों का घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है, जिसका आपके चरणकमलों में प्रेम है।

दोहा

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥ ४९ ॥

अर्थ:

हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु [आप] के चरणकमलों में मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तर में भी कभी न घटे।

दोहा 50 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥ हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठजी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकों को सुख देनेवाले श्रीरामजी ने हनुमानजी तथा भरतजी आदि भाइयों को साथ लिया।

चौपाई

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥ देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥ २ ॥

अर्थ:

और फिर कृपालु श्रीरामजी नगर के बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभु ने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिस ने चाहा, उस-उस को उचित जानकर दिया।

चौपाई

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

संसार के सभी श्रमों को हरनेवाले प्रभु ने [हाथी, घोड़े आदि बाँटने में] श्रम का अनुभव किया और [श्रम मिटाने को] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई (आमों का बगीचा) थी। वहाँ भरतजी ने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उस पर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे।

चौपाई

मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥ ४-५ ॥

अर्थ:

उस समय पवनपुत्र हनुमानजी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे--] हे गिरिजे! हनुमानजी के समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजी के चरणों का प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवा की [स्वयं] प्रभु ने अपने श्रीमुख से बार-बार बड़ाई की है।